चाइनीज माझा भारत पर बिना हथियार का हमला

चाइनीज माझा भारत पर बिना हथियार का हमला

चाइनीज़ मांझा : भारत पर बिना हथियार का हमला
यह कोई अफ़वाह नहीं है, न ही कोई प्रोपेगेंडा।
यह एक कड़वी सच्चाई है, एक भयावह हकीकत — जिसे हम रोज़ अपनी आँखों से देख रहे हैं और फिर भी अनदेखा कर रहे हैं।
चाइनीज़ मांझा आज भारत में केवल एक पतंग की डोर नहीं रह गया है, बल्कि यह जनहानि का हथियार बन चुका है। देश के अलग–अलग हिस्सों से रोज़ ऐसी घटनाएँ सामने आ रही हैं, जिनमें लोग गंभीर रूप से घायल हो रहे हैं, कई अपनी जान तक गंवा चुके हैं। पुलिस और प्रशासन को जगह–जगह होर्डिंग, बैनर, पोस्टर, सोशल मीडिया विज्ञापन और जागरूकता अभियान चलाने पड़ रहे हैं—सिर्फ़ यह समझाने के लिए कि चाइनीज़ मांझा जानलेवा है।
यह सोचने वाली बात है कि जिस देश में परंपराओं का इतना गौरवपूर्ण इतिहास रहा है, वहाँ आज उन्हीं परंपराओं के नाम पर लोग अपने ही नागरिकों की जान के दुश्मन बन बैठे हैं।
बिना युद्ध के हमला
चीन को भारत पर हमला करने के लिए न तो सैनिक भेजने पड़े, न हथियार उठाने पड़े।
उसने सिर्फ़ सस्ता, खतरनाक सामान बाज़ार में उतार दिया — और हम भारतीयों ने, मुनाफ़े और शौक़ के लालच में, उसे हाथों-हाथ अपना लिया।
चाइनीज़ मांझा बनाकर बेचा गया, दुकानों में खुलेआम रखा गया और हमने उसे खरीदा।
सिर्फ़ इस होड़ में कि —
“आज कितनी पतंगें काटी जाएँगी?”
इस एक शौक़ ने न जाने कितनी ज़िंदगियाँ छीन लीं।
किसी का गला कट गया, कोई बाइक से गिरकर मर गया, कोई अस्पताल में ज़िंदगी और मौत से जूझ रहा है।
प्रशासन की मजबूरी, जनता की लापरवाही
इंदौर हो या गुजरात — पुलिस को चौराहों पर बड़े-बड़े होर्डिंग लगाने पड़ रहे हैं:
हेलमेट पहनकर निकलें
गले में मफलर या दुपट्टा रखें
मोटरसाइकिल पर विशेष सुरक्षा ढांचा लगवाएँ
गुजरात में लोग बाइक पर कांच का विशेष फ्रेम लगाकर चलने को मजबूर हैं।
यह किसी आधुनिक विकास की निशानी नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक असंवेदनशीलता का प्रमाण है।
परंपराएँ पहले भी थीं, पतंगबाज़ी पहले भी होती थी 
लेकिन तब चायनीज मांझा  नही होने से किसी की जान नहीं जाती थी।
आज ज़िद, प्रतिस्पर्धा और दिखावे की होड़ ने परंपरा को हिंसा में बदल दिया है।
प्रतिबंध भी मज़ाक बन जाता है
सरकार प्रतिबंध लगाती है, प्रशासन सख़्ती करता है


और हम भारतीय क्या करते हैं?
“जिस चीज़ पर बैन लगे, वही दुगने दाम में खरीदो।”
यह मानसिकता ही हमें भीतर से खोखला कर रही है।
पैसे कमाने के लालच में दुकानदार, थोक व्यापारी और उपयोगकर्ता —
सब जाने-अनजाने में अपराध के भागीदार बनते जा रहे हैं।
यह सिर्फ़ मांझे की बात नहीं है
यह समस्या केवल चाइनीज़ मांझे तक सीमित नहीं है।
खाद्य सामग्री, खिलौने, सौंदर्य प्रसाधन, इलेक्ट्रॉनिक सामान —
कितनी ही चीज़ें हैं, जो मुनाफ़े के नाम पर हमारे ही देशवासियों के स्वास्थ्य और जीवन के लिए खतरा बन चुकी हैं।
आजादी के 75 वर्षों बाद भी,
देश के शीर्ष नेतृत्व को लोगों को यह सिखाना पड़ रहा है कि
शौचालय क्यों ज़रूरी है, स्वच्छता क्यों ज़रूरी है, और जीवन का मूल्य क्या है।
यह हमारी शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक चेतना पर भी एक गंभीर प्रश्नचिह्न है।
एक नागरिक की अपील
इस लेख का उद्देश्य किसी देश या समुदाय से नफ़रत फैलाना नहीं है,
बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक होने की याद दिलाना है।
देशहित का मतलब केवल नारे लगाना नहीं होता।
देशहित का मतलब यह भी है कि —
हम ऐसा कोई काम न करें, जिससे किसी निर्दोष की जान जाए
हम लालच में आकर दूसरों के हाथों की कठपुतली न बनें
हम अपनी परंपराओं को इंसानियत से जोड़कर निभाएँ, न कि हिंसा से
अगर आज हम नहीं चेते, तो कल किसी होर्डिंग पर लिखा होगा —
“यहां एक और ज़िंदगी चाइनीज़ मांझे की भेंट चढ़ गई।”
आइए, इतने संवेदनशील बनें कि
सरकार और प्रशासन को हमें इंसानियत सिखाने पर करोड़ों रुपये खर्च न करने पड़ें।
एक अच्छे नागरिक बनिए —
क्योंकि देश की सुरक्षा केवल सीमा पर नहीं,
हमारे हाथों में भी होती है।

संजय जोशी 
की कलम से
🖌️9993169734

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