आष्टा कृषि उपज मंडी में सोयाबीन की नई किस्म जेएस-2025 की ऊँची बोली ने छेड़ी चर्चा, किसानों के हितों पर फिर उठे सवाल।

आष्टा कृषि उपज मंडी में सोयाबीन की नई किस्म जेएस-2025 की ऊँची बोली ने छेड़ी चर्चा, किसानों के हितों पर फिर उठे सवाल।

आष्टा कृषि उपज मंडी में सोयाबीन की नई किस्म जेएस-2025 की ऊँची बोली ने छेड़ी चर्चा, किसानों के हितों पर फिर उठे सवाल।

आष्टा कृषि उपज मंडी में बुधवार को सोयाबीन की नई किस्म जेएस-2025 की नीलामी ने पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना दिया। बगड़ावदा निवासी किसान मुकेश अपनी सोयाबीन उपज मंडी विक्रय हेतु लेकर पहुँचे, जहाँ एक व्यापारी ने बोली लगाते हुए कीमत को सीधे 9452 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुँचा दिया। लगभग 10 क्विंटल उपज पर मिली यह दर सामान्य बाजार भाव की तुलना में कहीं अधिक रही, याने दुगनी जिससे मंडी परिसर में उत्सुकता और सवाल दोनों पैदा हो गए।
किसान मुकेश की मेहनत का परिणाम निश्चित रूप से सराहनीय माना जा सकता है। यह किस्म 90–100 दिनों में तैयार होने वाली, मजबूत तने तथा गुच्छों में फलने की विशेषता वाली बताई जा रही है, साथ ही प्राकृतिक परिस्थितियों को सहन करने की क्षमता भी इसमें अधिक बताई जाती है। कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में विकसित इस किस्म की उपलब्धता अभी सीमित किसानों तक ही है, जिससे भविष्य में इसके विस्तार की संभावनाएँ जताई जा रही हैं।
लेकिन इस ऊँची बोली के साथ ही एक बड़ा प्रश्न भी खड़ा हुआ है। वर्तमान में सोयाबीन का औसत बाजार मूल्य मिल एवं प्लांट स्तर पर बिल्टी सहित लगभग 5500–5600 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास बना हुआ है। ऐसे में सामान्य व्यापारिक गणित यह स्वीकार नहीं करता कि व्यापारी खुले बाजार से लगभग दोगुने भाव पर खरीदी कर सीधे प्रोसेसिंग या व्यापारिक उपयोग में लाभ कमा सके।
यही स्थिति किसानों के बीच शंका का कारण बन रही है। चर्चा यह भी है कि मंडी में ऊँचे दाम पर खरीदी गई ऐसी विशेष किस्म की उपज बाद में बिना मानक परीक्षण, बिना प्रमाणित प्रक्रिया और बिना वैधानिक बीज पंजीयन के “बीज” के रूप में किसानों को ऊँचे दाम पर बेची जाती है। यदि ऐसा होता है तो यह केवल व्यापारिक गतिविधि नहीं बल्कि कृषि व्यवस्था की पारदर्शिता और किसान संरक्षण तंत्र पर गंभीर प्रश्न है।
कृषि क्षेत्र में कार्यरत समितियाँ, बीज उत्पादक समूह, किसान प्रतिनिधि और संबंधित विभाग सभी किसानों के हितों की रक्षा के लिए बनाए गए हैं, लेकिन यदि अनियंत्रित बीज व्यापार जैसी गतिविधियाँ मंडियों में पनपती हैं तो यह व्यवस्था की निगरानी क्षमता पर भी सवाल खड़ा करती है। भोला-भाला किसान बेहतर उत्पादन और अधिक पैदावार की उम्मीद में ऊँचे दाम पर बीज खरीदता है, जबकि वास्तविक गुणवत्ता, प्रमाणन और वैधानिकता को लेकर उसे स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं होती।
आष्टा मंडी की यह घटना केवल एक नीलामी की कहानी नहीं, बल्कि कृषि बाजार की उस परत को उजागर करती है जहाँ पारदर्शिता, नियमन और किसान हितों के बीच संतुलन आवश्यक है। किसान मेहनत करता है, जोखिम उठाता है और उत्पादन करता है—इसलिए बाजार व्यवस्था की जिम्मेदारी बनती है कि वह उसके विश्वास को टूटने न दे।
आज आवश्यकता इस बात की है कि संबंधित विभाग इस प्रकार की ऊँची बोली वाली खरीदी के उद्देश्य, उपयोग और आगे की बिक्री प्रक्रिया पर स्पष्ट निगरानी सुनिश्चित करें। प्रमाणित बीज और सामान्य उपज के बीच अंतर की जानकारी किसानों तक पहुँचे, तथा मंडियों में होने वाली विशेष खरीदी पारदर्शी रिकॉर्ड में दर्ज हो।
सोयाबीन की नई किस्म की ऊँची बोली ने जहाँ किसान की मेहनत को सम्मान दिलाया, वहीं इसने कृषि व्यापार व्यवस्था के उन सवालों को भी सामने ला दिया है जिनका जवाब केवल चर्चा से नहीं, बल्कि ठोस निगरानी और पारदर्शी कार्रवाई से ही मिल सकता है।
किसान की उम्मीद और बाजार की व्यवस्था—दोनों के बीच विश्वास की यह डोर टूटे नहीं, यही समय की सबसे बड़ी मांग है।
संजय जोशी
9993169734

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